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जगत मिथ्या तो है पर….
यद्यपि ये सही है कि जगत मिथ्या है, माया है पर यह ऐसे ही है जैसे नाटक वास्तविकता नहीं होता, एक छद्म जीवनहोता है जो कलाकार को मंच पर जीना होता है| कलाकार जानते हैं कि वह मंच पर जो कुछ जीवन जी रहे हैं, वह वास्तविक जीवन नहीं है तथापि उनको इस काल्पनिक जीवन को पूरी इमानदारी और तल्लीनता के साथ निभाना है औरऐसे निभाना है कि दर्शक उसे सच मान बैठें, वाह-वाह कर उठें | पर पर्दा गिरते ही वह अपने वास्तविक जीवन में लौट आते हैं | मंच पर नायक और खलनायक एकदूसरे से लड़ते झगड़ते, एक दूसरे की ह्त्या के लिए उतारू दिखाई देते हैं पर मंच के पीछे वे एक दूसरे से गले मिलते हैं, साथ-साथ खाते पीते, उठते बैठते है... Read More →

